प्रेम प्राथना

🌹❤ प्रेम प्राथना ❤🌹

प्रार्थनायें तभी हो सकती हैं, जब तुम्हारा 'मैं' थोड़ा गले। तुम कैसे प्रार्थना करोगे? 'मैं' से भरे तुम्हारी सब प्रार्थनायेंझूठी हैं, सजावट से ज्यादा नहीं हैं। वह भी तुम दूसरों को दिखाने के लिए कर रहे हो। मंदिर में जाओ और अगर कोई प्रार्थना कर रहा हो...कोई न हो, तो धीरे-धीरे करता है, मरा-मरा करता है...चार लोग खड़े हों, जोर से करने लगता है कि इन चार को दिखाई पड़ जाए कि मैं प्रार्थना कर रहा हूं। तुम परमात्मा से प्रार्थना कर रहो हो या लोगों को दिखा रहे हो?लोगों को दिखाने में ज्यादा रस है; परमात्मा सुने या न सुने--लोग सुन लें, लोगों को पता चल जाए कि मैं धार्मिक आदमी हूं।

नहीं, जैसे ही 'मैं' गला, तप हुआ, उपवास हुआ।

उसने बहुत प्रार्थनायें कीं। फिर बहुत चांदों के बाद...।

अनेक रातें आईं, गईं; पूर्णिमायें आईं, गईं--वर्षों बीत गये। और जब तक उसे पक्का भरोसा न हो गया कि 'अब मैं नहीं हूं', तब तक वह लौटा नहीं।

फिर उसने वही द्वार खटखटाये। वही प्रश्न, 'बाहर कौन है?'

लेकिन इस बार उत्तर बदल गया।

इस बार उसने कहा, 'तू ही है।' और इस बार द्वार खुल गये।

क्योंकि प्रेम के द्वार तभी खुलते हैं, जब तुम ऐसे जाते हो जैसे तुम शून्य हो। तुम जब खाली गागर लेकर जाते हो परमात्मा के पास, तो वह सागर उतरता है। जब तुम खुद ही भरे हुए पहुंचते हो, तुम्हें और भरने का उपाय नहीं।

वर्षा होती है पहाड़ों पर भी, झीलों में भी, खाइयों में भी। पहाड़ खाली के खाली रह जाते हैं, वर्षा का पानी बह जाता है, गङ्ढे भर जाते हैं, झीलें बन जाती हैं। पहाड़ पहले से ही खड़े हैं, उनकी अकड़ का कोई अंत नहीं; झीलें खाली हैं। परमात्मा तो सब पर बरस रहा है। अगर तुम्हारे 'मैं' का पहाड़ मौजूद है, तुम खाली रह जाओगे। अगर 'ना-मैं' की झील गहरी है, गङ्ढा गहरा है, तुम भर जाओगे। जो खाली हैं, वे भर दिये जायेंगे; जो भरे हैं, वे खाली रह जायेंगे--यही पात्रता है।

एकमात्र पात्रता है--तुम्हारा परिपूर्ण खाली होना। जिस दिन तुम परिपूर्ण खाली हो, उस दिन अतिथि आयेगा। उस दिन सच तो यह, तुम्हें उसके द्वार पर जाकर दस्तक देने की जरूरत न होगी, वह आयेगा और तुम्हारे द्वार पर स्वयं दस्तक देगा।

'पाछे पाछे हरि फिरें, कहत कबीर कबीर।'

वह तुम्हें बुलाता, तुम्हें खोजता आ जायेगा। अहंकार के साथ तुम उसे खोजते हो, कभी खोज न पाओगे; निरहंकार होते ही वह तुम्हें खोजता चला आता है। यह खोजएकत्तरफा नहीं है। तुम्हीं परमात्मा को नहीं खोज रहे हो,परमात्मा भी तुम्हें खोज रहा है। तुम अकेले ही उसे नहीं पुकार रहे हो, उसने भी तुम्हें पुकारा है। तुम अकेले ही उससे मिलकर आनंदित न होओगे, वह भी परम आनंदित होगा। उस दिन पूरा अस्तित्व प्रफुल्लित होगा, जिस दिन तुम घर लौट आओगे।

लेकिन अगर 'मैं' से भरकर तुमने पुकारा, तुम्हारी कोई पुकार वहां तक न पहुंचेगी; घर खाली नहीं है। वह आये भी तो कैसे आये? द्वार बंद है। वह प्रवेश भी करे तो कैसे प्रवेश करे? तुम पीठ किए खड़े हो। वह तुम्हें खोजे भी तो कैसेखोजे? तुमने सब तरफ से बाधायें खड़ी कर रखी हैं। और तुम प्रार्थनायें भी कर रहे हो। प्रार्थनाओं का मूल्य नहीं है, तुम मिट जाओ। क्योंकि तुम्हारा मिटना ही एक मात्र प्रार्थना है।

             🌹❤ Osho ❤🌹
                                   
🌹🌹 Zorba The Buddha 🌹🌹

        🌹🌹🌹🙏🌹🌹🌹

ओशो....

ओशो....

मैं एक कहानी पढ़ता था। यूरोप का एक बहुत बड़ा विचारक हुआ, एडमंड बर्क। वह रोज सुनने जाता था एक पादरी को। पादरी ने एक दिन चर्च में कहा कि जो लोग पुण्यात्मा हैं और परमात्मा में भरोसा करते हैं, वे स्वर्ग जाते हैं। एडमंड बर्क खड़ा हो गया। उसने कहा, मुझे एक बात पूछनीहै। आपने दो बातें कहीं, कि जो लोग पुण्यात्मा हैं, और परमात्मा में भरोसा करते हैं, वे स्वर्ग जाते हैं। मैं पूछता हूं कि जो लोग पुण्यात्मा हैं और परमात्मा में भरोसा नहीं करते, वे कहां जाते हैं? और मैं यह भी पूछना चाहता हूं कि जो परमात्मा में भरोसा करते हैं और पुण्यात्मा नहीं हैं, वे कहां जाते हैं?

एडमंड बर्क की जिज्ञासा एकदम प्रामाणिक थी। पादरी भी ठगा सा रह गया। अब क्या कहे? उसे बड़ी उलझन हो गयी। अगर वह कहे कि जो लोग पुण्यात्मा हैं और परमात्मा में भरोसा नहीं करते, वे भी स्वर्ग जाते हैं; तो स्वभावतः बर्क कहेगा, फिर परमात्मा में भरोसे की जरूरत क्या है? पुण्य ही काफी है। और अगर मैं कहूं कि जो लोग पुण्यात्मा हैं और परमात्मा में भरोसा नहीं करते, वे स्वर्ग नहीं जाते; तो बर्क कहेगा, तो फिर पुण्य की झंझट में पड़ने की क्या जरूरत? परमात्मा में भरोसा काफी है। पादरी ने कहा, मुझे तुमने उलझन में डाल दिया। थोड़ा मुझे सोचने का समय दो; कल।

रातभर पादरी सो न सका। आदमी निष्ठावान रहा होगा। चालाक नहीं, बुद्धिमान रहा होगा। बहुत सोचा, लेकिन उलझन न हल हुई। सुबह-सुबह, भोर होते-होते, रातभर का जागा सोचता-सोचता नींद लग गयी। नींद में उसने एक सपना देखा कि वह एक ट्रेन में बैठा है। उसने लोगों से पूछा, यह ट्रेन कहां जा रही है? उन्होंने कहा, यह स्वर्ग जा रही है। उसने कहा, चलो अच्छा हुआ! यही तो मुझे पूछना था। यह अच्छा ही हुआ, आंख से ही देख लूंगा। तो उसने सोच रखे नाम मन में--जैसे सुकरात; परमात्मा में भरोसा नहीं करता था, आदमी पुण्यात्मा था। जैसे बुद्ध; इससे और पुण्य की साकार प्रतिमा कहां पाओगे? लेकिन आदमी परमात्मा में भरोसा नहीं करता था। तो उसने कहा, ठीक है, अगर ये बुद्ध और ये सुकरात स्वर्ग में मिल गए तो उत्तर साफ हो जाता है, कि परमात्मा में भरोसे की जरूरत नहीं। अगर ये स्वर्ग में न मिले, तो भी उत्तर साफ हो जाता है कि पुण्य से कुछ भी न होगा, असली चीज परमात्मा में भरोसा है।

स्वर्ग के स्टेशन पर उतरा, बड़ी हैरानी हुई। स्टेशन बड़ा उदास था। जैसे कई जमानों की धूल जमी हो, किसी ने साफ न की हो। थोड़ा हैरान हुआ। जाकर गौर से देखा तख्ती पर, तो स्वर्ग ही लिखा है। गांव में प्रविष्ट हुआ, बड़ी बेरौनक थी बस्ती। कहीं फूल खिलते न मालूम पड़ते थे। और किसी घर से वीणा के स्वर न उठते थे। कहीं कोई नाचता न मिला। मिले भी ऐसे--धर्मगुरु, पादरी, मुनि; मगर कोई रौनक न मिली। ऐसे जैसे मुर्दे चल रहे हों। कहीं कोई महोत्सव न मिला। जिंदगी ऐसी लगी जैसे एक बोझ हो वहां। उसने पूछा कई से कि सुकरात, गौतम बुद्ध? लोगों ने कहा, नाम सुने नहीं। यहां नहीं हैं। दूसरी जगह, नर्क में खोजो।

भागा स्टेशन आया। पूछा कि नर्क की गाड़ी? भाग्य से खड़ी थी, जा ही रही थी। वह बैठ गया। नर्क पहुंचा तो बड़ा हैरान होने लगा। जैसे किसी महोत्सव में प्रवेश हो रहा हो। बड़ा स्वच्छ था स्टेशन। जीवन मालूम पड़ता था। फूल खिले थे, गीत बजते थे, लोग चलते थे तो उनके पैरों में गति थी, रौनक थी, रंग-बिरंगापन था, जीवन का इंद्रधनुष जैसे खिला था। वह बड़ा हैरान हुआ कि यह तो कुछ गड़बड़ है। नाम में, तख्ती में कुछ भूल-चूक हो गयी। इसको स्वर्ग होना चाहिए। उसने पूछा कि सुकरात और बुद्ध? उन्होंने कहा कि हां, वे यहां हैं। और नाम में कोई गलती नहीं हुई है। उनके आने से ही यह नर्क स्वर्ग हो गया।

नींद खुल गयी उसकी। घबड़ाहट में नींद खुल गयी कि यह क्या मामला है? सपना तो खो गया। जब वह सुबह चर्चगया, उसने कहा कि भई, मैं कुछ और न कह सकूंगा, लेकिन रात एक सपना आया है वह मैं दोहरा देता हूं उत्तर में। सपने में मुझे ऐसा दिखायी पड़ा; कहां तक सही है, कहां तक झूठ है, कुछ कह नहीं सकता। मेरी कोई सामर्थ्य भी नहीं इसका निर्णय लेने की। इतना मुझे दिखायी पड़ा और वह यह कि जहां भी पुण्यात्मा पुरुष पहुंच जाते हैं, वहीं स्वर्ग है। जहां पापी पहुंच जाते हैं, वहीं नर्क है। पापी नर्क जाते हैं, ऐसा नहीं। पापी अपना नर्क अपने साथ लेकर चलते हैं। और पुण्यात्मा स्वर्ग जाते हैं, ऐसा नहीं। पुण्यात्मा अपना स्वर्ग अपने साथ लेकर चलते हैं। तुम उन्हें कहीं भी फेंक दो।

और मुझे भी बात जंचती है। सपना नहीं, सच मालूम होती है। बुद्ध को तुम नर्क में भी डाल दो तो तुम नर्क में न डाल सकोगे। यह असंभावना है। बुद्ध वहां स्वर्ग खड़ा कर लेंगे। बुद्ध अपना स्वर्ग अपने साथ लेकर चलते हैं, वह बुद्ध के जीवन की हवा है। वह उनके आसपास चलता हुआ मौसम है। उसको तुम उनसे छीन न सकोगे। नर्क बदल जाएगा, बुद्ध न बदलेंगे। तुम बुद्ध को दुखी नहीं कर सकते, तो तुम नर्क में कैसे डाल सकते हो? तुम तुम्हारे तथाकथित धर्मगुरुओं को सुखी नहीं कर सकते, तुम स्वर्ग कैसे भेज सकते हो?

बस इसी धुन में रहा मर के मिलेगी जन्नत

तुझको ऐ शेख न जीने का करीना आया

हे धर्मगुरु, तुझे जीने का करीना न आया। तू इसी आशा में रहा कि मरकर मिलेगा स्वर्ग। जिसने जीते जी स्वर्ग न पाया, वह मरकर कैसे पा लेगा? जब जीते जी चूक गए तो मुर्दा होकर कैसे पा लोगे? स्वर्ग तो होता है तो जीवन से जुड़ताहै, मौत से नहीं। स्वर्ग होता है तो जीवन से निकलता है। मौत से कैसे निकलेगा? स्वर्ग मरघटों में नहीं है। स्वर्ग वहां है जहां जीवन नाचता है हजार-हजार रंगों में। स्वर्ग वहां है जहां जीवन की धुन बज रही है हजार-हजार स्वरों में। स्वर्ग वहां है जहां तुम जितने गहरे जीवंत हो जाते हो।

स्वर्ग सिकुड़ना नहीं है, फैलाव है। इसलिए हिंदुओं ने अपने परम सत्य को ब्रह्म कहा है। ब्रह्म का अर्थ होता है,विस्तीर्ण। ब्रह्म का अर्थ है, जो फैलता ही गया है। जिसकी कोई सीमा नहीं आती।

तुमने कभी खयाल किया, दुख सिकुड़ता है, आनंद फैलता है। दुख का स्वभाव है सिकुड़ना। जब तुम दुखी होते हो, तब तुम चाहते हो द्वार-दरवाजे बंद करके बैठ जाओ। कोई मिलने न आए, किसी से बात न करनी पड़े, बाजार न जाना पड़े। तब तुम अपने को बंद कर लेना चाहते हो। सिकुड़करपड़ जाना चाहते हो बिस्तर में। अगर बहुत ही दुखी हो जाता है आदमी, तो मरने की चेष्टा करने लगता है। कब्र में समा जाना चाहता है, ताकि फिर कभी कोई दुबारा न मिले। अकेला हो जाऊं। इसलिए दुखी आदमी आत्मघात कर लेता है। लेकिन जब सुख भरता है, जब महासुख उतरता है, जब तुम नाचते होते हो, तब तुमसे कोई कहे घर में बैठो; तुम कहोगे, नहीं, अभी तो जाना है, अभी तो बांटना है, अभी तो फैलना है।

तुमने देखा, महावीर और बुद्ध जब दुखी थे, जंगल भाग गए। लेकिन जब आनंदित हुए, जब उतरा अमृत उनके जीवन में, लौट आए वापस बस्ती में। इस पर किसी ने कभी कोई सोचा नहीं, कि जब वे दुखी थे तब जंगल भाग गए थे--अकेले में। उसकी बड़ी कथाएं शास्त्रों में हैं, कि उन्होंने सब छोड़ दिया और जंगल चले गए। लेकिन इस संबंध में शास्त्र कुछ भी नहीं कहते कि एक दिन उन्होंने जंगल छोड़ दिया और बस्ती में वापस आ गए।

वह दूसरी घटना और भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि जब आनंद उनके जीवन में उतरा तो बांटने का भाव भी आया। आनंद के साथ आती है करुणा। आनंद के साथ आती है एक अभीप्सा कि बांटो, लुटो। जो मिला है, उसे दूसरों को दे दो। क्योंकि आनंद का एक स्वभाव है: बांटो, बढ़ता है; न बांटो,घटता है। लुटाओ, बढ़ता है; छिपाओ, मरता है।

एस धम्‍मो सनंननो--(प्रवचन--05)

प्रेम बेशर्त है

                        "___  प्रेम बेशर्त है  ___"
          मुल्ला नसरुद्दीन के घर मैं एक दिन मेहमान था।
                उसकी पत्नी अमीर घर की लड़की है।
और जैसा अमीर घर की लड़कियां होती हैं, एक तो पत्नियां वैसे ही उपद्रव, गरीब घर की हों तो भी, अमीर घर की पत्नी तो फिर बहुत उपद्रव। वह हर छोटी बात में याद दिला देती है मुल्ला को कि यह शानदार मकान न होता अगर मेरे बाप के पास पैसे न होते;

प्रेम खतरनाक है

🌹❤ प्रेम खतरनाक है ❤🌹

प्रार्थना तुम मंदिर में करते हो।
लेकिन तुम प्रार्थना को सीखोगे कहां?
उसका स्वाद तुम्हें कहां मिलेगा?

अगर तुमने जीवन में प्रेम जाना हो तो मंदिर के द्वार खुलेंगे। क्योंकि जीवन में जिसने प्रेम को जाना वह आज नहीं कल मंदिर के द्वार पर दस्तक देगा। क्योंकि जब प्रेम में इतना रस पाया तो प्रार्थना में कितना रस न मिलेगा! प्रेम ही तो खींचेगा। जब एक बूंद पाकर इतना मिल गया तो सागर में कितना न मिलेगा! प्रेम अगर बूंद है, बिंदु है, तो प्रार्थना सागर है, सिंधु है।

और प्रेम उपलब्ध है। और प्रेम के लिए कोई थियोलाजी, कोई धर्मशास्त्र की जरूरत नहीं। और प्रेम के लिए किसी गुरु की आवश्यकता नहीं। प्रेम तो परमात्मा ने तुम्हें दिया ही है। परमात्मा की महान अनुकंपा है कि उसने तुम्हें सारभूत दिया है, जिसको अगर तुम खोल लो तो उसी से तुम्हारा मार्ग खुल जाएगा। तुम्हारे पास उपकरण है।

जीसस का बड़ा प्रसिद्ध वचन है: लव! एंड थ्रू लव यू विल नो गॉड। बिकाज लव इज़ गॉड। प्रेम करो! प्रेम से तुम परमात्मा को जानोगे। क्योंकि परमात्मा प्रेम है।

यहां बड़ी बारीक बात है। जीसस ने यह नहीं कहा, लव गॉड सो दैट यू कैन नो गॉड। जीसस ने यह नहीं कहा कि परमात्मा को प्रेम करो, ताकि तुम परमात्मा को जान सको। जीसस ने कहा, लव! एंड यू विल नो गॉड। प्रेम करो! और तुम परमात्मा को जान लोगे। क्योंकि परमात्मा प्रेम है।

इसलिए थोड़ी देर को परमात्मा को भूल जाएं, प्रेम को ही समझ लें कि प्रेम क्या है। उसी समझ में धीरे-धीरे प्रार्थना भी प्रकट होनी शुरू हो जाती है। प्रेम की प्रगाढ़ता प्रार्थना बन जाती है।

प्रेम है दो व्यक्तियों का मिलन; प्रेम है ऐसा क्षण जहां दो व्यक्ति अपने अहंकार को अलग हटा देते हैं; जहां दो व्यक्ति अहंकार को बीच में लेकर नहीं मिलते, अहंकार को हटा कर मिलते हैं। प्रेम है समर्पण दो व्यक्तियों का, एक-दूसरे के प्रति। प्रेम है भरोसा। प्रेम है इस भांति की चेष्टा कि देह तो दो होंगी, लेकिन आत्मा एक होगी।

और प्रेम प्रशिक्षण है। अगर तुमने प्रेम ही नहीं किया–और तुमने हजार उपाय कर लिए हैं ताकि तुम प्रेम न कर सको। विवाह तुमने ईजाद कर लिया है प्रेम से बचने को। जैसे संप्रदाय ईजाद किए हैं धर्म से बचने को ऐसा विवाह ईजाद किया है प्रेम से बचने को। प्रेम को काट ही दिया है। इसीलिए तो होशियार कौमें, चालाक कौमें बच्चों को प्रेम नहीं करने देतीं; मां-बाप तय करते हैं। मां-बाप के तय करने में प्रेम को छोड़ कर और सभी चीजों का विचार किया जाता है। धन का, कुल का, पद का, प्रतिष्ठा का, सब बातों का विचार किया जाता है, सिर्फ प्रेम को छोड़ कर। और इसीलिए तो बाल-विवाह प्रचलित रहा है। क्योंकि अगर युवक हो जाएं तो फिर तुम प्रेम को बिना विचारे छोड़ न पाओगे; फिर प्रेम भीतर घुस जाएगा।

और प्रेम सारे अर्थशास्त्र को बिगाड़ देता है। प्रेम खतरनाक सूत्र है। क्योंकि प्रेम जानता नहीं कि कौन भंगी है, कौन ब्राह्मण है। प्रेम जानता नहीं कि कौन हिंदू है, कौन मुसलमान है। प्रेम तो सिर्फ प्रेम की भाषा जानता है। और सब, कुछ नहीं जानता। प्रेम संप्रदाय नहीं जानता। इसलिए तो मैंने कहा कि विवाह और संप्रदाय समानांतर, साथ-साथ हैं। प्रेम गरीब और अमीर को नहीं जानता। अमीर गरीब के प्रेम में पड़ सकता है; गरीब सम्राट के प्रेम में पड़ सकता है। प्रेम बड़ा खतरनाक है; कहां ले जाएगा, कुछ पता नहीं।

             🌹❤ Osho ❤🌹
                                   
🌹🌹 Zorba The Buddha 🌹🌹

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लाओत्से

लाओत्से को मानने वाले एक छोटा सा प्रयोग सदियों से करते रहे हैं।
और वह प्रयोग बड़ा बढ़िया है। वे कहते हैं कि जब तक आपके
भीतर केंद्र का ही आपको पता
नहीं है, यू कैन नॉट ग्रो, तब तक आपमें कोई विकास
नहीं हो सकता। तो वे एक छोटा सा प्रयोग करते हैं। दो
छोटे से आप हौज बना लें और पानी भर दें। बराबर एक
मात्रा के हौज, एक सा पानी। एक हौज में एक लोहे का
डंडा लगा दें बीच में केंद्र पर। और एक हौज में डंडा न
लगाएं, खाली रखें, बिना केंद्र का। दो मछलियां, एक
ही उम्र की, उन दोनों में छोड़ दें। आप
हैरान होंगे, जिसमें डंडा लगा हुआ है, उसकी
मछली जल्दी बढ़ेगी; और
जिसमें डंडा नहीं लगा है, उसकी
मछली जल्दी नहीं
बढ़ेगी।
जिसमें डंडा लगा हुआ है, वह मछली उसका चक्कर
लगाती रहेगी दिन-रात। केंद्र है और केंद्र
के आस-पास वह घूमती चली
जाती है, घूमती चली
जाती है। जिस हौज में डंडा नहीं लगा है,
उसकी मछली इधर-उधर
भटकती रहेगी। कहीं कोई
केंद्र नहीं है, जिसके आस-पास घूम सके।
उसकी ग्रोथ नहीं होगी, वह
स्वस्थ नहीं होगी, बीमार रह
जाएगी। यह हजारों साल से चलता हुआ प्रयोग है
और सदा इसका एक ही परिणाम होता है कि जिसमें
केंद्र है जिस हौज में, उसकी मछली
स्वस्थ, जल्दी विकसित होती है, ज्यादा
ताजी, ज्यादा जीवंत होती है।
लाओत्से को मानने वाले कहते हैं कि जिस व्यक्ति को अपने केंद्र
का पता चल जाता है, उसकी चेतना उस केंद्र का
इसी मछली की तरह चक्कर
लगाने लगती है। और तब चेतना में विकास शुरू हो जाता
है। जिनको केंद्र का ही पता नहीं है, वे
उस मछली की तरह रह जाएंगे–बेजान,
लोच, निर्जीव। क्योंकि कोई केंद्र नहीं है,
जिसके आस-पास वे घूम सकें और विकसित हो सकें। उनको दिशा
ही नहीं मालूम पड़ेगी–कहां
जाएं? क्या करें? क्या हो जाएं? भटकेंगे वे भी। एक
ही परिधि पर निरंतर परिभ्रमण से चेतना विकसित
होती है।
तो लाओत्से कहता है कि यह जो नाभि का केंद्र है, आपको पता
चल जाए, तो आपकी चेतना को एकाग्र गति मिल
जाती है–ए कनसनट्रेटेड मूवमेंट।
आपकी चेतना फिर वहीं घूमती
रहती है।
लाओत्से कहता है, चलो, लेकिन ध्यान नाभि का रखो। बैठो, ध्यान
नाभि का रखो। उठो, ध्यान नाभि का रखो। कुछ भी करो,
लेकिन तुम्हारी चेतना नाभि के आस-पास
घूमती रहे। एक मछली बन जाओ और
नाभि के आस-पास घूमते रहो। और शीघ्र
ही तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर एक नई
शक्तिशाली चेतना का जन्म हो गया।
इसके अदभुत परिणाम हैं। और इसके बहुत प्रयोग हैं। आप यहां
एक कुर्सी पर बैठे हुए हैं। लाओत्से कहता है कि
आपके कुर्सी पर बैठने का ढंग गलत है।
इसीलिए आप थक जाते हैं। लाओत्से कहता है,
कुर्सी पर मत बैठो। इसका यह मतलब
नहीं कि कुर्सी पर मत बैठो,
नीचे बैठ जाओ। लाओत्से कहता है,
कुर्सी पर बैठो, लेकिन कुर्सी पर वजन
मत डालो। वजन अपनी नाभि पर डालो।
अभी आप यहीं प्रयोग करके देख सकते
हैं। एम्फेसिस का फर्क है। जब आप कुर्सी पर
वजन डाल कर बैठते हैं, तो कुर्सी सब कुछ हो
जाती है, आप सिर्फ लटके रह जाते हैं
कुर्सी पर, जैसे एक खूंटी पर कोट लटका
हो। खूंटी टूट जाए, कोट तत्काल जमीन
पर गिर जाए। कोट की अपनी कोई
केंद्रीयता नहीं है, खूंटी केंद्र
है। आप कुर्सी पर बैठते हैं–लटके हुए कोट
की तरह।
लाओत्से कहता है, आप थक जाएंगे। क्योंकि आप चैतन्य मनुष्य
का व्यवहार नहीं कर रहे हैं और एक जड़ वस्तु को
सब कुछ सौंपे दे रहे हैं। लाओत्से कहता है, कुर्सी
पर बैठो जरूर, लेकिन फिर भी अपनी नाभि
में ही समाए रहो। सब कुछ नाभि पर टांग दो। और घंटों
बीत जाएंगे और आप नहीं थकोगे।
अगर कोई व्यक्ति अपनी नाभि के केंद्र पर टांग कर
जीने लगे अपनी चेतना को, तो थकान–
मानसिक थकान–विलीन हो जाएगी। एक
अनूठा ताजापन उसके भीतर सतत प्रवाहित रहने
लगेगा। एक शीतलता उसके भीतर
दौड़ती रहेगी। और एक आत्मविश्वास, जो
सिर्फ उसी को होता है जिसके पास केंद्र होता है, उसे
मिल जाएगा।
तो पहली तो इस साधना की व्यवस्था है कि
अपने केंद्र को खोज लें। और जब तक नाभि के करीब
केंद्र न आ जाए–ठीक जगह नाभि से दो इंच
नीचे, ठीक नाभि भी
नहीं–नाभि से दो इंच नीचे जब तक केंद्र
न आ जाए, तब तक तलाश जारी रखें। और फिर इस
केंद्र को स्मरण रखने लगें। श्वास लें तो यही केंद्र
ऊपर उठे, श्वास छोड़ें तो यही केंद्र नीचे
गिरे। तब एक सतत जप शुरू हो जाता है–सतत जप। श्वास के
जाते ही नाभि का उठना, श्वास के लौटते ही
नाभि का गिरना–अगर इसका आप स्मरण रख सकें…।
कठिन है शुरू में। क्योंकि स्मरण सबसे कठिन बात है। और सतत
स्मरण बड़ी कठिन बात है। आमतौर से हम सोचते हैं
कि नहीं, ऐसी क्या बात है? मैं एक
आदमी का नाम छह साल तक याद रख सकता हूं।
यह स्मरण नहीं है; यह स्मृति है। इसका फर्क
समझ लें। स्मृति का मतलब होता है, आपको एक बात मालूम है,
वह आपने स्मृति के रिकाघडग को दे दी। स्मृति ने उसे
रख ली। आपको जब जरूरत पड़ेगी, आप
फिर रिकार्ड से निकाल लेंगे और पहचान लेंगे। स्मरण का अर्थ है:
सतत, कांसटेंट रिमेंबरिंग।
आप जरा कोशिश करें, एक पांच मिनट के लिए प्रयोग करें कि मैं
अपने पेट के उठने और गिरने का खयाल रखूंगा, भूलूंगा
नहीं। दो सेकेंड बाद आप पाएंगे, आप भूल चुके हैं,
कुछ और कर रहे हैं। फिर घबड़ाहट आएगी कि यह
तो मैं भूल गया, दो सेकेंड भी याद नहीं रख
सका! श्वास अभी भी चल
रही है, पेट अब भी हिल रहा है; लेकिन
आप कहीं गए। फिर लौटा लाएं अपने स्मरण को। अगर
आप निरंतर प्रयास करें, तो धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे, सेकेंड-सेकेंड आपका स्मरण
बढ़ेगा। और जिस दिन आप कम से कम तीन मिनट
सतत, मुतवातिर, एक क्षण को भी बिना चूके–
तीन मिनट कोई लंबा वक्त नहीं है, लेकिन
जब प्रयोग करेंगे, तब आपको पता चलेगा कि तीन साल
से भी लंबा मालूम पड़ेगा–एक दफे भी
चूकें नहीं, तीन मिनट केवल! तो आपको
पता चलेगा कि अब आपको केंद्र का ठीक-
ठीक अनुभव होना शुरू हो गया। और तब सब
शरीर अलग और केंद्र अलग झलकने लगेगा।
और यह केंद्र ऊर्जा का केंद्र है। इससे जो संयुक्त है,
उसकी महिमा अपार है। क्योंकि वह निरंतर अनंत
ऊर्जा को उपलब्ध कर रहा है।
तो एक तो सतत स्मरण रखें नाभि के केंद्र का और उसके आस-
पास ही अपनी चेतना को परिभ्रमण करने
दें। वही मंदिर है, उसकी ही
परिक्रमा जारी रखें। कुछ भी हो जाए–
क्रोध हो, घृणा हो, वैमनस्य हो,र् ईष्या हो, दुख हो, सुख हो–
लाओत्से कहता है, हर हालत में, कुछ भी हो, पहला
काम नाभि पर लौटने का करें, फिर दूसरा काम कुछ भी
करें। किसी ने खबर दी कि प्रियजन मर
गए, तो पहले नाभि पर जाएं और फिर इस खबर को ग्रहण करें।
और तब, लाओत्से कहता है, कोई भी मर जाए, चित्त
पर कोई चोट नहीं पहुंचेगी।
कभी आपने खयाल न किया हो, लेकिन शायद
कभी खयाल आया भी हो, या
पीछे लौट कर प्रत्यभिज्ञा हो जाए, जब
भी आपको कोई बहुत गहरी खबर सुनाता
है, खुशी की या दुख की, तो
चोट नाभि पर लगती है। रास्ते पर आप चले जा रहे
हैं, साइकिल पर या कार में और एकदम एक्सीडेंट होने
की हालत आ गई, आपने खयाल किया है कि
पहली चोट नाभि पर लगती है, धड़ से नाभि
पर चोट जाती है। नाभि कंपित होती है,
तभी सब कुछ कंपित होता है।
लाओत्से कहता है, जब भी कुछ हो, तो आप सचेतन
रूप से पहले नाभि पर जाएं। पहला काम नाभि, फिर दूसरा कोई
भी काम। तो न सुख आपको सुखी कर
पाएगा इतना कि आप पागल हो जाएं, न दुख आपको
दुखी कर पाएगा इतना कि आप दुख से एक हो जाएं।
तब आपका केंद्र अलग और परिधि पर घटने वाली
घटनाएं अलग रह जाएंगी। और आप
साक्षी मात्र रह जाएंगे। योग कहता है,
साक्षी की साधना करो। लाओत्से कहता है,
सिर्फ नाभि को सतत स्मरण रखो, साक्षी
की घटना फलित हो जाएगी, घटित हो
जाएगी।
यह जो नाभि का केंद्र है, जिस दिन ठीक-
ठीक पता चल जाए, उसी दिन आप मृत्यु
और जन्म के बाहर हो जाते हैं। क्योंकि जन्म के पहले यह नाभि
का केंद्र आता है; और मृत्यु के बाद यही बचता है,
बाकी सब खो जाता है। तो जो व्यक्ति भी
इस केंद्र को जान लेता है, वह जान लेता है, न तो मेरा जन्म है
और न मेरी मृत्यु है। वह अजन्मा और अमृत हो
जाता है।
सतत स्मरण रखें। केंद्र को खोजें, सतत स्मरण रखें।
पहली बात, केंद्र को खोज लें। दूसरी बात,
स्मरण रखें। तीसरी बात, बार-बार जब
स्मरण खो जाए, तो स्मरण खोता है इसका भी स्मरण
रखें। वह थोड़ा कठिन पड़ेगा।
जैसे कि आप किसी चीज पर ध्यान दे रहे
हैं। तो लोग मेरे पास आते हैं, वे कहते हैं, हमने नाभि पर ध्यान
दिया, लेकिन वह खो जाता है। फिर क्या करें? तो उनसे मैं कहता हूं,
खो गया, इसको भी स्मरण रखें कि अब खो गया। इसको
भी ध्यान का हिस्सा बनाएं। बी अटेंटिव
ऑफ दि इनअटेंशन आल्सो। वह जो घटना घट रही है
खोने की, उसको भी ध्यानपूर्वक! उसको
भी गैर-ध्यानपूर्वक मत खोने दें। जब भी
चूक जाएं, तत्काल स्मरण करें कि चूक गया। वापस लौट जाएंगे,
कुछ और करने की जरूरत नहीं, सिर्फ
इतना स्मरण कि चूक गया, स्मरण वापस लौट आएगा, धारा फिर जुड़
जाएगी।
और चौथी बात, जब स्मरण पूरा हो जाए, केंद्र स्पष्ट
दिखाई पड़ने लगे, अनुभव होने लगे, तो सब कुछ केंद्र के लिए
समर्पित कर दें, सरेंडर कर दें। उस केंद्र को ही कह
दें कि तू ही मालिक है, अब मैं छोड़ता हूं। और यह
आसान हो जाता है।
समर्पण बहुत कठिन है, जब तक केंद्र का पता न हो। लोग
कहते हैं, परमात्मा के लिए समर्पण कर दो। लेकिन परमात्मा का
कोई पता नहीं। जिसका पता नहीं, उसके
लिए समर्पण कैसे कर दो? और परमात्मा आ भी जाए,
तो भी समर्पण आपको करना हो, तो मालिक तो आप
ही बने रहते हैं समर्पण के भी। अगर
कल दिल नाराज हो जाए और लगे कि यह परमात्मा कुछ
अपनी मनपसंद का नहीं, तो अपना
समर्पण वापस ले ले सकते हैं कि छोड़ो, हमने अपना समर्पण
वापस लिया। देने वाले हम थे, ले भी हम सकते हैं।
क्या, परमात्मा करेगा क्या? अगर आप अपना समर्पण वापस ले लें,
तो परमात्मा करेगा क्या? तो जो समर्पण वापस भी लिया
जा सकता है, वह समर्पण तो नहीं है। वह दिया
ही नहीं गया कभी।
लाओत्से की प्रक्रिया अलग है। लाओत्से कहता है,
जिस दिन इस केंद्र का पता चलता है, उस दिन समर्पण करना
नहीं पड़ता, आपको अनुभव होने लगता है कि केंद्र
मालिक है ही, मेरे बिना केंद्र सब कुछ कर रहा है।
श्वास ले रहा है, छोड़ रहा है; जीवन की
धारा चल रही है; नींद आ
रही है, जागरण आ रहा है; जन्म हो रहा है, मृत्यु
हो रही है; सब केंद्र कर रहा है मेरे बिना कुछ किए।
तो अब समर्पण का क्या सवाल है? समर्पण हो जाता है।
तो चौथी, आखिरी जो घटना है इस साधना में,
वह है केंद्र के प्रति समर्पण को अनुभव कर लेना। फिर अहंकार
के बचने का कोई उपाय नहीं–कोई उपाय
ही नहीं। ऐसी समर्पित
अवस्था में व्यक्ति परम सत्ता को उपलब्ध हो जाता है।